Tuesday, December 01, 2009

Mat Kaho Aakaash Mein Kuhra Ghana Hai...

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से, क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है, हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है
।

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था, शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है ।


- दुष्यन्त कुमार

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